आजादी की खातिर इन 10 वीरांगनाओं ने छोड़ा घर का ऐशो-आराम, अंग्रेजों से लिया लोहा

आजादी की खातिर इन 10 वीरांगनाओं ने छोड़ा घर का ऐशो-आराम, अंग्रेजों से लिया लोहा

भारत इस साल अपनी आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। 15 अगस्त 1947 को देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली थी, लेकिन इस स्वतंत्रता के पीछे अनगिनत वीरों और वीरांगनाओं का संघर्ष, त्याग और बलिदान छिपा है। आजादी की इस लड़ाई में जहां पुरुष क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला, वहीं देश की कई महिलाओं ने भी अपने सुख-सुविधाओं से भरे जीवन को छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा।
इन वीरांगनाओं ने न सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की, बल्कि अपने साहस और संघर्ष से अंग्रेजों को दांतों तले चने चबाने पर मजबूर कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इन महिलाओं की भूमिका आज भी प्रेरणा देती है। उन्होंने अपने परिवार, महलों और आरामदायक जीवन से दूर होकर देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने का संकल्प लिया। उनका संघर्ष इस बात की मिसाल है कि देश के लिए आगे बढ़ने में नारी शक्ति कभी पीछे नहीं रही। इस स्वतंत्रता दिवस पर आइए इतिहास के उन पन्नों को फिर से पलटते हैं और जानते हैं उन 10 वीरांगनाओं के बारे में, जिन्होंने अपने साहस, त्याग और संघर्ष से आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल कायम की।
विजया लक्ष्मी पंडित
एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाली विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। जिन्होंने ऐशो-आराम और प्रभावशाली पारिवारिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद, देश की आजादी के संघर्ष से खुद को दूर नहीं रखा। वह महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुईं और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। विजयलक्ष्मी पंडित का योगदान केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रहा और आजादी के बाद उन्होंने भारतीय राजनीति और कूटनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाई। वह भारत की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं और बाद में देश की विदेश सेवा में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। इसके अलावा वर्ष 1953 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनकर इतिहास रचा।
सुचेता कृपलानी
सुचेता कृपलानी स्वतंत्रता संग्राम की उन प्रमुख महिलाओं में शामिल थीं, जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई के साथ-साथ आगे चलकर भारतीय राजनीति में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई। भारत के विभाजन के दौरान जब देश सांप्रदायिक हिंसा और दंगों की आग में झुलस रहा था, तब उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर राहत और शांति स्थापित करने के काम में अहम भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सक्रिय रूप से काम किया। इसके अलावा उन्हें भारतीय संविधान के निर्माण के लिए गठित संविधान सभा का सदस्य चुना गया। वहीं आजादी के बाद सुचेता कृपलानी ने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। साल 1963 में वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और देश की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में इतिहास रचा।
ऊषा मेहता
ऊषा मेहता स्वतंत्रता संग्राम की उन साहसी महिलाओं में शामिल थीं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गुप्त रूप से आवाज बुलंद की। उन्हें ‘सीक्रेट कांग्रेस रेडियो’ शुरू करने के लिए जाना जाता है। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान यह रेडियो कुछ महीनों तक सक्रिय रहा और इसके जरिए आंदोलन से जुड़ी खबरें लोगों तक पहुंचाई जाती थीं। महात्मा गांधी की अनुयायी ऊषा मेहता की इस भूमिका के कारण उन्हें गिरफ्तार कर पुणे की येरवड़ा जेल भेज दिया गया।
सरोजिनी नायडू
सरोजिनी नायडू को उनकी मधुर और प्रभावशाली कविताओं के कारण ‘भारत कोकिला’ के नाम से जाना जाता है। वह एक बेहतरीन कवयित्री होने के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख महिला सेनानी भी थीं। उन्होंने खिलाफत आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की। इसके अलावा सरोजिनी नायडू ने देशभर में घूमकर लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं।
लक्ष्मी सहगल
लक्ष्मी सहगल पेशे से डॉक्टर थीं, लेकिन देश की आजादी की लड़ाई में उन्होंने अपने पेशे से आगे बढ़कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका पूरा नाम लक्ष्मी स्वामीनाथन सहगल था। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधारा से प्रभावित होकर आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) में शामिल हुईं और महिलाओं की रानी झांसी रेजिमेंट की कमान संभाली। साल 1998 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। और साल 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में वह वाम मोर्चे की उम्मीदवार बनीं, हालांकि इस चुनाव में एपीजे अब्दुल कलाम ने जीत हासिल की।

 

रानी लक्ष्मीबाई
भारत में जब भी महिला सशक्तिकरण, साहस और स्वाभिमान की बात होती है, महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का नाम जरूर लिया जाता है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जिस अदम्य साहस के साथ मोर्चा संभाला, वह आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। झांसी की रानी ने मुश्किल परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और अपने राज्य तथा देश की रक्षा के लिए अंग्रेजों का डटकर सामना किया।
रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और बलिदान की गाथा को कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी अमर कविता के जरिए जन-जन तक पहुंचाया। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति “खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी।” आज भी रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस की याद दिलाती है।
दुर्गाबाई देशमुख

 

दुर्गाबाई देशमुख उन महिलाओं में शामिल थीं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ समाज सुधार के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह महात्मा गांधी के विचारों से बेहद प्रभावित थीं और उनके सत्याग्रह आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुईं। देश की आजादी के लिए संघर्ष करने के साथ उन्होंने एक वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। दुर्गाबाई देशमुख लोकसभा की सदस्य भी रहीं और योजना आयोग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक सुधार और कल्याण के लिए किए गए उनके प्रयासों ने उन्हें एक प्रभावशाली महिला नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया।

अरुणा आसफ अली
अरुणा आसफ अली भी स्वतंत्रता संग्राम की उन साहसी महिलाओं में शामिल थीं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सक्रिय रूप

 

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