बांग्लादेश की राजनीति में 35 साल बाद एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। देश में हुए ऐतिहासिक राष्ट्रपति चुनाव में BNP के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने जीत दर्ज की है। इसके साथ ही वह बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति बन गए हैं। मिर्जा फखरुल को प्रधानमंत्री तारिक रहमान का करीबी और भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है। राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने जमात-ए-इस्लामी समर्थित उम्मीदवार और पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल ओली अहमद को हराया।
बांग्लादेश में राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल 349 सांसद वोट देने के पात्र थे। इनमें से 343 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 6 सांसदों ने वोट नहीं डाला। जिसमें मिर्जा फखरुल को 255 वोट मिले जबकि ओली अहमद के पक्ष में 88 वोट पड़े। साल 1991 के बाद पहली बार बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए संसद के अंदर बाकायदा मतदान हुआ और इस चुनाव में बैलेट बॉक्स के जरिए वोट डाले गए।
35 साल बाद क्यों हुआ राष्ट्रपति चुनाव?
भारत की तरह बांग्लादेश में भी राष्ट्रपति का चुनाव सीधे आम जनता नही करती, बल्कि संसद के सदस्य करते है, और साल 1991 के बाद संसदीय व्यवस्था दोबारा स्थापित होने के बाद से आमतौर पर सत्तारूढ़ दल अपने पसंदीदा उम्मीदवार को राष्ट्रपति पद के लिए आगे करता था। संसद में सत्तारूढ़ दल के पास बहुमत होने के कारण उसका उम्मीदवार आसानी से चुन लिया जाता था। इस वजह से राष्ट्रपति पद के लिए अलग-अलग उम्मीदवारों के बीच वास्तविक मुकाबला देखने को नहीं मिला। यानी सांसदों के सामने चुनाव में विकल्प होने के बजाय ज्यादातर मौकों पर एक ही उम्मीदवार होता था और राष्ट्रपति निर्विरोध चुने जाते रहे। इन चुनावों में सत्तारूढ़ दल के पास पर्याप्त समर्थन होने और विपक्ष की ओर से मजबूत वैकल्पिक उम्मीदवार नहीं उतारे जाने के कारण आम तौर पर मतदान मुकाबले में तब्दील नहीं हुआ। इसलिए 2026 का चुनाव अलग है, क्योंकि इस बार दो उम्मीदवार मैदान में थे और सांसदों ने बाकायदा वोट डालकर राष्ट्रपति चुना।
क्यों खास है यह चुनाव?
साल 2024 में बांग्लादेश में हुए जेन-ज़ी आंदोलन और उसके बाद की राजनीतिक उथल-पुथल ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया। इस आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने देश की कमान संभाली। फरवरी 2026 में हुए आम चुनाव के बाद बांग्लादेश की राजनीतिक परिस्थितियां एक बार फिर बदल गईं। चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सत्ता में वापसी हुई और तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद संभाला। इसी बदले राजनीतिक माहौल में राष्ट्रपति पद के लिए सत्ताधारी BNP और विपक्षी खेमे के बीच सहमति नहीं बन पाई। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति पद खाली हुआ। इसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नए राष्ट्रपति के चुनाव की जरूरत पड़ी।
यही वजह है कि करीब 35 साल बाद बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए सही तरीके से चुनाव हुआ और मिर्जा फखरुल राष्ट्रपति चुने गए। इस तरह से मिर्जा फखरुल मिर्जा फखरुल का राष्ट्रपति चुना जाना बांग्लादेश की हालिया राजनीतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता के नए दौर का संकेत माना जा रहा है। हालांकि देश में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से संवैधानिक और औपचारिक होता है। सरकार की वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के पास रहती है, लेकिन 35 साल बाद हुआ यह मुकाबला बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक व्यवस्था और सत्ता के नए समीकरणों को भी दिखाता है।
कौन हैं मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर?
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बांग्लादेश की राजनीति एक का जाना-पहचाना चेहरा हैं। वह लंबे समय से BNP से जुड़े हुए हैं, और पार्टी के महासचिव के तौर पर भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है 78 वर्षीय मिर्जा फखरुल पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना सरकार के दौर में BNP के प्रमुख विपक्षी नेताओं में शामिल रहे हैं। इसके अलावा उनका राजनीतिक अनुभव और पार्टी में मजबूत पकड़ उन्हें BNP के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल करती है।