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पार्थिव पटेल क्यों नहीं बने भारतीय टीम के चीफ सिलेक्टर? सामने आई बड़ी वजह

पार्थिव पटेल क्यों नहीं बने भारतीय टीम के चीफ सिलेक्टर? सामने आई बड़ी वजह

भारतीय क्रिकेट में चीफ सेलेक्टर को लेकर चल रही अटकलों के बीच अब तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। पूर्व भारतीय स्पिनर प्रज्ञान ओझा को अजित अगरकर के जाने के बाद मुख्य चयनकर्ता बनाया गया है। हालांकि, बीसीसीआई की ओर से अभी स्थायी नियुक्ति को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इस महीने की शुरुआत से ही अजित अगरकर के कार्यकाल को लेकर चर्चा तेज थी और 3 सितंबर को मुंबई में BCCI की समीक्षा बैठक हुई थी इस बैठक में भारतीय टीम के हालिया प्रदर्शन, खिलाड़ियों की फिटनेस, वर्कलोड और आगे की रणनीति पर चर्चा हुई थी। लेकिन अगरकर इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे।

हालांकि, उस समय बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने साफ किया था कि बैठक में अगरकर के भविष्य या चयन समिति में बदलाव को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई थी। इसके बाद अगरकर ने बीसीसीआई को अपने कार्यकाल के बाद आगे नहीं बढ़ने की इच्छा के बारे में जानकारी दी। जानकारी के अनुसार, उनका मौजूदा कार्यकाल 4 अक्टूबर को समाप्त होना है। जिसके लिए प्रज्ञान ओझा को नए चीफ सेलेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया हैं।

पार्थिव पटेल का नाम क्यों था मजबूत?

नए चीफ सेलेक्टर पद के लिए पार्थिव पटेल को शुरुआत से ही मजबूत दावेदार माना जा रहा था। और पिछले कुछ महीनों से बीसीसीआई के भीतर उनका नाम अगले चीफ सेलेक्टर के संभावित विकल्प के तौर पर चर्चा में था। क्योंकि पार्थिव पटेल ने भारत के लिए 25 टेस्ट, 38 वनडे और 2 टी20 इंटरनेशनल मैच खेले हैं। लेकिन इस दौड़ में एक बड़ा सवाल सामने आया कि अगर पार्थिव पटेल चीफ सेलेक्टर बनते हैं तो उनकी मौजूदा कमर्शियल कमाई और नए पद के बीच कितना अंतर होगा? इसी मुद्दे पर बीसीसीआई और पार्थिव के बीच बातचीत आगे बढ़ने में मुश्किल आने की बात सामने आई थी।

कमर्शियल कमाई बनी बड़ी अड़चन

BCCI जब किसी पूर्व दिग्गज खिलाड़ी को अपने सिस्टम से जोड़ता है, तो कई बार उसकी मौजूदा कमाई का भी ध्यान रखा जाता है। खिलाड़ी की सैलरी के साथ उसकी दूसरी कमाई की भरपाई को भी पैकेज में शामिल किया जाता है। रवि शास्त्री के टीम इंडिया डायरेक्टर बनने और वीवीएस लक्ष्मण के एनसीए हेड बनने के समय भी ऐसी व्यवस्था की गई थी।

पार्थिव पटेल के मामले में यही व्यवस्था बोर्ड के लिए मुश्किल बन गई। उनकी सालाना कमाई करीब 10 से 12 करोड़ रुपये बताई जाती है। इसमें कमेंट्री और एक्सपर्ट के तौर पर करीब 2 से 4 करोड़, जबकि आईपीएल टीमों के साथ कोचिंग से 1.5 से 3 करोड़ रुपये की कमाई शामिल है। इसके अलावा विज्ञापनों से भी उन्हें करीब 3 करोड़ रुपये मिलते हैं। ऐसे में अगर चीफ सेलेक्टर की 3 करोड़ रुपये सालाना सैलरी के साथ पार्थिव की कमाई की भरपाई भी जोड़ी जाती, तो बीसीसीआई को करीब 10 करोड़ रुपये सालाना खर्च करने पड़ते। यही वजह है कि मजबूत दावेदार होने के बावजूद पार्थिव पटेल प्रज्ञान ओझा से पीछे रह गए।

प्रज्ञान ओझा के पक्ष में क्या गया?

गौरतलब है कि प्रज्ञान ओझा पहले से ही सीनियर पुरुष चयन समिति का हिस्सा हैं। बीसीसीआई की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, चयन समिति में अजित अगरकर के साथ शिव सुंदर दास, अजय रात्रा, आरपी सिंह और प्रज्ञान ओझा शामिल थे। वहीं अगरकर के हटने के बाद ओझा मौजूदा चार सदस्यीय समिति में सबसे ज्यादा टेस्ट खेलने वाले सदस्य हैं। क्योंकि उन्होंने भारत के लिए 24 टेस्ट मैच खेले हैं। इसी वजह से अंतरिम व्यवस्था में उन्हें समिति का नेतृत्व सौंपे जाने की बात सामने आई है।

इसके अलावा 29 सितंबर को गुवाहाटी में भारतीय टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर ने चारों चयनकर्ताओं—प्रज्ञान ओझा, शिव सुंदर दास, अजय रात्रा और आरपी सिंह—के साथ चर्चा की। यह बैठक न्यूजीलैंड दौरे के लिए टीमों की तैयारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण थी। क्योंकि भारत को अक्टूबर से नवंबर के बीच न्यूजीलैंड में टी20, वनडे और टेस्ट सीरीज खेलनी है। इसके साथ ही इंडिया ए टीम का दौरा भी होना है। ऐसे में चयन समिति के सामने खिलाड़ियों के वर्कलोड और अलग-अलग फॉर्मेट के लिए टीम संयोजन तैयार करने की चुनौती होगी।

इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि प्रज्ञान ओझा को अंतरिम तौर पर चयन समिति की कमान मिल चुकी है, जबकि स्थायी चीफ सेलेक्टर के तौर पर उनकी नियुक्ति पर अंतिम आधिकारिक मुहर का इंतजार है। दूसरी ओर, पार्थिव पटेल का नाम मजबूत दावेदार के तौर पर सामने आया था, लेकिन कमर्शियल शर्तों पर सहमति नहीं बनने की रिपोर्टों ने उनकी दावेदारी को प्रभावित किया।

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