Nana Patekar Passes Away: हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 75 साल की उम्र में गोवा स्थित अपने घर पर उनका निधन हो गया। नाना पाटेकर को उनकी दमदार आवाज, बेबाक अंदाज और किरदारों में जान डाल देने वाली अदाकारी के लिए हमेशा याद किया जाएगा। गंभीर भूमिकाओं से लेकर कॉमेडी तक, उन्होंने हर तरह के किरदार को अपनी खास शैली में निभाया। उनके कई संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस अभिनेता को पूरी दुनिया ‘नाना पाटेकर’ के नाम से जानती है, उनका जन्म के समय नाम नाना नहीं था बल्कि उनका असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। वहीं ‘नाना’ नाम के पीछे भी एक बेहद साधारण लेकिन दिलचस्प कहानी जुड़ी है।

विश्वनाथ से नाना कैसे बने?
नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनका मूल नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर बताया जाता है। वहीं बचपन में स्कूल के दिनों में उन्हें विश्वनाथ और ‘विशू’ नाम से पुकारा जाता था। लेकिन आगे चलकर ‘नाना’ नाम उनकी इतनी बड़ी पहचान बन गया कि उनका मूल नाम पीछे छूट गया। खुद नाना पाटेकर ने अपने एक इंटरव्यू नाना नाम पड़ने के पीछे का किस्सा सुनाया और बताया था कि उनकी मां की एक बेहद करीबी सहेली थीं, जो उनके लिए बहन जैसी थीं। वह बचपन में उन्हें प्यार से ‘नाना’ कहकर बुलाया करती थीं। धीरे-धीरे यह नाम उनके आसपास के लोगों के बीच भी चलन में आ गया और फिर यही नाम उनकी स्थायी पहचान बन गया।
नाना ने इस इंटरव्यू में यह भी बताया था कि उन्हें यह नाम इतना ज्यादा पसंद आया कि उनके पासपोर्ट और दूसरे आधिकारिक दस्तावेजों में भी नाना नाम ही दर्ज रहा। यानी बचपन में प्यार से मिला एक नाम आगे चलकर उनकी सार्वजनिक और आधिकारिक पहचान का एक अहम हिस्सा बन गया।
स्कूल में ‘विशू’ नाम से बुलाते थे
आज भले ही देश और दुनिया उन्हें नाना पाटेकर या फिर उनके फिल्मी किरदारों से नाम उदय शेट्टी के नाम से जानती हो, लेकिन उनके स्कूल के दिनों की पहचान कुछ और थी। अभिनेता के अनुसार, उस समय उन्हें विश्वनाथ या ‘विशू’ कहकर बुलाया जाता था। उन्होंने यह भी बताया था कि अगर आज कोई उन्हें ‘विशू’ कहकर बुलाए तो वह समझ जाते हैं कि सामने वाला उनके स्कूल के दिनों का कोई पुराना परिचित है।

फिल्मों ने ‘नाना’ नाम को बनाया मशहूर
नाना पाटेकर ने अपने लंबे करियर में थिएटर से लेकर हिंदी और मराठी सिनेमा तक अपनी अलग छाप छोड़ी। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘तिरंगा’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘वेलकम’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब पसंद किया। उनकी खासियत सिर्फ संवाद बोलना नहीं थी, बल्कि वह अपने किरदार की भावनाओं को इस तरह पर्दे पर उतारते थे कि दर्शक उससे जुड़ जाते थे। यही वजह रही कि उनका नाम एक ऐसे कलाकार के तौर पर स्थापित हुआ, जिसकी स्क्रीन पर मौजूदगी ही किरदार को अलग वजन दे देती थी।
जिस नाम की शुरुआत बचपन में मां की सहेली के प्यार से हुई थी, वही नाम आगे चलकर भारतीय सिनेमा की एक बड़ी पहचान बन गया। विश्वनाथ पाटेकर से नाना पाटेकर बनने की यह कहानी भले ही छोटी और बेहद साधारण हो, लेकिन इसमें उनके जीवन की सादगी की झलक दिखाई देती है।
आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार, उनकी दमदार आवाज, संवाद बोलने का अनोखा अंदाज और उनकी फिल्मों की यादें लंबे समय तक दर्शकों के बीच जिंदा रहेंगी। यही वजह है कि विश्वनाथ पाटेकर को दुनिया ने भले ही ‘नाना’ के नाम से जाना, लेकिन भारतीय सिनेमा में उनकी पहचान हमेशा एक ऐसे कलाकार की रहेगी, जिसने अपने हर किरदार को सिर्फ निभाया नहीं, बल्कि उसे जिया।
ये भी पढ़ें:- Nana Patekar Passes Away: नहीं रहे दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर, 75 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

