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CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज और SIR पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई, जानिए क्या है पूरा मामला?

CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज और SIR पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई, जानिए क्या है पूरा मामला?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह सुनवाई करेगा। मंगलवार को याचिका का उल्लेख भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष किया गया, जिसके बाद अदालत ने मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई हैं।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों को लेकर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आई है। याचिका दाखिल करने वाले राकेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से मामले की जल्द सुनवाई का आग्रह किया। उनका तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव संबंधी शक्तियां किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग नामक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था की हैं।

14 फैसलों पर आपत्ति का दावा

इस याचिका में यह दलील दी गई है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR और मतदाता सूची से जुड़े कम से कम 14 फैसलों या आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। यह दावा द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सामने आया था, जिसमें दोनों चुनाव आयुक्तों के हवाले से कहा गया कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए गए। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन दावों पर अपनी अलग स्थिति स्पष्ट की है। आयोग के मुताबिक, दोनों आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र एक प्रतिनियुक्त अधिकारी से जुड़े प्रशासनिक मामले से संबंधित थे और उनका नीति या सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के मामलों से संबंध नहीं था। आयोग ने SIR से जुड़े आदेशों को लेकर भी अपने निर्णयों का बचाव किया है।

याचिका में अनुच्छेद 324 का हवाला

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि संविधान के अनुच्छेद 324(1) में चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार निर्वाचन आयोग को दिया गया है। याचिका के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष होते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल अकेले अध्यक्ष द्वारा किया जा सकता है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324(2) और 324(3) के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि बहुसदस्यीय आयोग में निर्णय सर्वसम्मति से या मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। इसी आधार पर SIR से जुड़े कुछ फैसलों की वैधता पर सवाल उठाया गया है।

क्या मांग की गई है?

बता दें कि इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट से क्वो वारंटो की रिट जारी करने की मांग की गई है। इसके जरिए यह पूछा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने किस कानूनी अधिकार के तहत कथित तौर पर निर्वाचन आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल किया। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग से संबंधित मूल रिकॉर्ड और दस्तावेज अदालत के सामने मंगाने की मांग की है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि विवादित फैसले आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए थे या नहीं। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि यदि जांच में यह पाया जाता है कि आयोग की सामूहिक सहमति या बहुमत के बिना ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल किया गया, तो उसे कानूनी अधिकार के बिना किया गया कार्य घोषित किया जाए।

SIR को भी चुनौती

याचिका का एक अहम हिस्सा देशभर में चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़ा है। इसमें SIR और उसके तहत लिए गए फैसलों, निर्देशों और अन्य कार्रवाइयों को शुरुआत से ही अमान्य घोषित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह प्रक्रिया आवश्यक संवैधानिक या वैधानिक अधिकार के बिना और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना शुरू की गई। साथ ही SIR के आधार पर मतदाता सूची में किए गए नाम जोड़ने, हटाने, बहाल करने या संशोधित करने के फैसलों की वैधता पर भी सवाल उठाया गया है। हालांकि, याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि संविधान, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत सामान्य कानूनी प्रक्रिया से किए गए बदलावों पर इसका असर नहीं होना चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ अगले सप्ताह इस मामले पर सुनवाई करेगी। उस दौरान अदालत के सामने मुख्य सवाल चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका और SIR से जुड़े विवादित फैसलों की कानूनी वैधता से संबंधित होंगे।

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