Lucknow News: न्याय व्यवस्था से जुड़ी भाषा अगर आम आदमी की समझ में आसानी से आए, तो न्याय तक उसकी पहुंच और अधिक सहज हो सकती है। इसी जरूरत को रेखांकित करते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने न्यायपालिका में राजभाषा हिंदी के अधिक से अधिक प्रयोग पर जोर दिया। लखनऊ में आयोजित हिंदी पखवाड़ा समापन समारोह में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में हिंदी का प्रयोग बढ़ाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस दौरान न्यायपालिका में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने में वास्तविक अवरोध विषय पर भी चर्चा की गई।
अवध बार एसोसिएशन, उच्च न्यायालय और उत्तर प्रदेश हिंदी विधि प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने हिंदी के महत्व और न्यायिक व्यवस्था में इसके इस्तेमाल को लेकर अपने विचार रखे। वहीं इस कार्यक्रम में न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी, कार्यक्रम संयोजक एवं अवध बार एसोसिएशन एल्डर कमेटी के सदस्य वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद आरिफ खान, हिंदी विधि प्रतिष्ठान के अध्यक्ष देश रतन मिश्रा और संचालक एस.एस. चौबे सहित अन्य गणमान्य लोग भी मौजूद रहे।
हिंदी करोड़ों लोगों की भावनाओं और अभिव्यक्ति का माध्यम
इस कार्यक्रम के दौरान ब्रजेश पाठक ने कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं और अभिव्यक्ति का माध्यम है। हिंदी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह सभी को स्वीकार करती है और हिंदी सबकी भाषा है। इसके अलावा उन्होंने न्यायपालिका में ऐसी भाषा के इस्तेमाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया, जिसे आम नागरिक आसानी से समझ सके। उनका कहना था कि न्याय व्यवस्था में आमजन की सहज भागीदारी और उसकी समझ को बढ़ाने के लिए सरल एवं सुगम भाषा का प्रयोग महत्वपूर्ण है।
लोकतांत्रिक और संवैधानिक विकास में अधिवक्ताओं की अहम भूमिका
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि आजादी के बाद देश में जब पहली बार चुनाव हुआ, तब चुनाव लड़ने वाले लोगों में बड़ी संख्या अधिवक्ताओं की थी। उन्होंने कहा कि देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक विकास में अधिवक्ता समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रहे है। क्योंकि कानून और न्याय से जुड़े विषय आम लोगों के जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे में न्याय व्यवस्था में भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिससे आम नागरिक अपने अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ सके।
अंग्रेजी के प्रभाव का भी किया जिक्र
डिप्टी सीएम ने यह भी कहा कि लंबे समय तक चली औपनिवेशिक व्यवस्था के प्रभाव के कारण अंग्रेजी को एक विशेष वर्ग की भाषा के रूप में स्थापित किया गया था। लेकिन अब आवश्यकता है कि भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी को न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों में अधिक व्यापक स्थान मिले। उन्होंने कहा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के अधिक इस्तेमाल से आम नागरिक न्याय व्यवस्था से खुद को और अधिक सहजता से जोड़ सकेगा। इस चर्चा में न्यायपालिका में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने में आने वाली वास्तविक बाधाओं पर भी विचार-विमर्श किया गया।
बता दें कि हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इसी अवसर पर विभिन्न सरकारी विभागों और संस्थानों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए हिंदी पखवाड़े से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान हिंदी में कामकाज, लेखन और अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने के साथ विभिन्न प्रतियोगिताएं और कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। हर बार की तरह इस बार भी उत्तरप्रदेश में 14 सितंबर से 28 सितंबर तक हिंदी पखवाड़ा दिवस मनाया गया। ऐसे में हिंदी पखवाड़े के समापन के मौके पर न्यायपालिका में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने की जरूरत का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है।
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