इस गुफा में है गणेश जी के कटे सिर का रहस्य! जानें पाताल भुवनेश्वर की पौराणिक कहानी

इस गुफा में है गणेश जी के कटे सिर का रहस्य! जानें पाताल भुवनेश्वर की पौराणिक कहानी

Hindu dharm : हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार किसी भी शुभ या नए कार्य को शुरू करने से पहले गणेश पूजन करना शुभ माना जाता है। घर में किसी भी प्रकार की पूजा या हवन क्यों न किया जा रहा हो, सभी पूजा कर्मों से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। गणेश जी को प्रथम पूजनीय माने जाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। सामान्य मनुष्य की तरह शरीर लेकिन गज के सिर वाले भगवान गणेश हमेशा से ऐसे नहीं थे। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में मौजूद पाताल भुवनेश्वर गुफा देश की उन रहस्यमयी धार्मिक जगहों में शामिल है, जहां प्राकृतिक चट्टानों में देवी-देवताओं की आकृतियां दिखाई देती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी गुफा में भगवान गणेश का वह मस्तक मौजूद है, जिसे भगवान शिव ने क्रोध में उनके धड़ से अलग किया था।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण डालकर उसे गणेश नाम दिया। माता पार्वती ने गणेश जी को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान कर रही हैं, तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दें। गणेश जी पूरी निष्ठा से द्वार पर पहरा देने लगे। तभी भगवान शिव वहां पहुंचे और अंदर जाने की कोशिश की, लेकिन गणेश जी ने माता के आदेश का हवाला देते हुए उन्हें रोक दिया। समझाने के बावजूद जब गणेश जी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे तो भगवान शिव क्रोधित हो गए और उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। पुत्र की यह दशा देखकर माता पार्वती बेहद क्रोधित हुईं और गणेश जी को फिर से जीवित करने की मांग की। तब भगवान शिव ने हाथी का मस्तक लगाकर गणेश जी को नया जीवन दिया। इसके बाद उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान मिला। तभी से किसी भी शुभ कार्य, पूजा या नए काम की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण और पूजन से करने की परंपरा चली आ रही है। लेकिन यहां कहानी में एक बड़ा सवाल पैदा होता है—गणेश जी का वह पुराना सिर आखिर गया कहां?

कहां है भगवान गणेश का कटा हुआ सिर?

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट के पास स्थित है पाताल भुवनेश्वर गुफा। जिला प्रशासन के मुताबिक यह एक प्राचीन गुफा मंदिर है, जहां जाने के लिए संकरे भूमिगत रास्ते से गुजरना पड़ता है। गुफा के अंदर चूना-पत्थर की प्राकृतिक संरचनाओं में गणेश, शिवलिंग और अन्य धार्मिक आकृतियां दिखाई देती हैं। सबसे खास मान्यता भगवान गणेश के मस्तक से जुड़ी है। धार्मिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काट दिया था और बाद में उनके शरीर पर हाथी का सिर लगाया गया, तब मूल मस्तक को इसी गुफा में रखा गया। यहां मौजूद शिलारूपी आकृति को भक्त आदिगणेश से जोड़कर देखते हैं।

गणेश जी के मस्तक पर गिरती है जल की बूंद

गुफा से जुड़ी मान्यता का एक और रहस्यमय हिस्सा यहां मौजूद 108 पंखुड़ियों वाले ब्रह्मकमल जैसी प्राकृतिक संरचना है। कहा जाता है कि इससे पानी की बूंद लगातार गणेश जी की शिलारूपी आकृति पर गिरती है और मुख्य बूंद उनके मुख पर पड़ती दिखाई देती है।

चार युगों से जुड़ा है रहस्य

पाताल भुनेश्वर गुफा में चार पत्थरों को चार युगों का प्रतीक माना जाता हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इनमें से कलयुग का प्रतीक पत्थर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ रहा हैं। कहा जाता है कि जब यह पत्थर ऊपर स्थित छत से टकराएगा तब कलयुग समाप्त होगा। यह भी आस्था और लोकविश्वास का हिस्सा हैं।

एक गुफा में कई तीर्थों के दर्शन

इस गुफा की खासियत सिर्फ गणेश जी की मान्यता तक सीमित नहीं है। यहां बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से जुड़ी शिलारूप आकृतियों के भी दर्शन होने की बात कही जाती है। गुफा की प्राकृतिक संरचनाएं इसे धार्मिक आस्था के साथ-साथ भूगर्भीय दृष्टि से भी आकर्षक बनाती हैं। पाताल भुवनेश्वर का जिक्र स्कंद पुराण की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि त्रेता युग में राजा ऋतुपर्ण यहां पहुंचे थे और उन्होंने भगवान शिव समेत अनेक देवी-देवताओं के दर्शन किए। बाद में आदि शंकराचार्य से भी इस गुफा की पुनर्खोज की परंपरा जुड़ी हुई है।

यही वजह है कि पाताल भुवनेश्वर सिर्फ एक गुफा नहीं, बल्कि प्राकृतिक संरचनाओं, पौराणिक कथाओं और धार्मिक आस्था का अनोखा संगम मानी जाती है। गणेश जी के कटे सिर की कहानी हो या चार युगों से जुड़ा पत्थर—इस जगह से जुड़ी मान्यताएं आज भी लोगों के बीच जिज्ञासा पैदा करती हैं।

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