Ganesh Chaturthi 2026: गणपति बप्पा के आगमन का इंतजार अब खत्म होने वाला है। घर-घर में एक बार फिर ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे गूंजेंगे और श्रद्धालु अपने आराध्य भगवान गणेश का स्वागत करेंगे। गणेश चतुर्थी का पर्व सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भक्तों के लिए आस्था, उमंग और नई उम्मीदों से जुड़ा खास अवसर भी माना जाता है। मान्यता है कि विघ्नहर्ता भगवान गणेश जिस घर में विराजते हैं, वहां सुख-समृद्धि आती है और जीवन के संकट दूर होते हैं।
हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से गणेश उत्सव की शुरुआत होती है। महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में इस पर्व की अलग ही रौनक देखने को मिलती है। कहीं भव्य पंडाल सजते हैं तो कहीं घरों में परिवार के लोग मिलकर गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं। हालांकि, इस बार गणेश चतुर्थी की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस बना हुआ है कि गणपति बप्पा 14 सितंबर को घर आएंगे या 15 सितंबर को। अगर आपके मन में भी यही सवाल है तो पंचांग के अनुसार सही तारीख क्या है, बप्पा की स्थापना के लिए कौन सा समय शुभ रहेगा और पूजा किस विधि से करनी चाहिए, आइए जानते हैं पूरी जानकारी…
14 या 15 सितंबर, कब मनाई जाएगी गणेश चतुर्थी?
हिंदू पंचांग के मुताबिक, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से शुरू होगी और 15 सितंबर को सुबह 7 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इसलिए उदया तिथि के बजाय मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी के आधार पर गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। यानी इस साल गणपति बप्पा की स्थापना 14 सितंबर को की जाएगी। इसके साथ ही दस दिवसीय गणेश उत्सव की शुरुआत होगी। भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार बप्पा को घर में विराजमान करेंगे और पूरे उत्सव के दौरान उनकी पूजा-अर्चना करेंगे।
गणेश उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। इस साल 25 सितंबर 2026, शुक्रवार को गणपति विसर्जन किया जाएगा। हालांकि, कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार तीसरे, पांचवें या सातवें दिन भी गणपति बप्पा का विसर्जन करते हैं।
गणपति स्थापना के लिए क्या रहेगा शुभ मुहूर्त?
गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करने के लिए सुबह 11 बजकर 2 मिनट से दोपहर 1 बजकर 31 मिनट तक का समय शुभ माना जा रहा है। इस दौरान विधि-विधान से गणपति बप्पा की स्थापना कर उनकी पूजा की जा सकती है। पूजा के लिए इस समय को खास माना जाता है क्योंकि यह भगवान गणेश के जन्म से जुड़े मध्याह्न काल के आसपास पड़ता है। अगर किसी कारण से इस अवधि में पूजा करना संभव न हो तो श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा कर सकते हैं।
ऐसे करें गणपति बप्पा की स्थापना और पूजा
गणेश चतुर्थी के दिन सबसे पहले पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। इसके बाद चौकी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करें। प्रतिमा स्थापित करते समय इस बात का ध्यान रखें कि गणपति जी का मुख सही दिशा में हो और पूजा के लिए स्थान साफ-सुथरा रहे। इसके बाद हाथ में जल लेकर पूजा का संकल्प लें और भगवान गणेश का ध्यान करें। गणपति जी को जल, अक्षत, फूल, रोली और सिंदूर अर्पित करें। इसके बाद दूर्वा चढ़ाएं। गणेश पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व माना गया है। पूजा के दौरान धूप और दीप जलाएं और भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करें। खासतौर पर ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। इसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा पढ़ें या सुनें और अंत में भगवान गणेश की आरती करें।
बप्पा को क्यों चढ़ाई जाती है दूर्वा?
गणपति पूजा में दूर्वा का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दूर्वा भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है। इसलिए पूजा के दौरान दूर्वा अर्पित करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ दूर्वा चढ़ाने से गणपति प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
मोदक के बिना अधूरी मानी जाती है गणेश पूजा
गणपति बप्पा की पूजा में मोदक का भोग भी विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मोदक भगवान गणेश के प्रिय भोगों में शामिल है। यही वजह है कि गणेश उत्सव के दौरान घरों में तरह-तरह के मोदक बनाए जाते हैं और सबसे पहले उन्हें बप्पा को अर्पित किया जाता है। गणेश चतुर्थी का यह पर्व भक्तों के लिए सिर्फ भगवान की प्रतिमा स्थापित करने का अवसर नहीं, बल्कि परिवार के साथ मिलकर श्रद्धा और खुशी बांटने का भी समय है। दस दिनों तक बप्पा की पूजा के बाद जब विसर्जन का समय आता है तो माहौल भावुक हो जाता है। भक्त ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयकारों के साथ अपने आराध्य को विदाई देते हैं और अगले साल फिर उनके आगमन की कामना करते हैं।