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भारत को बर्बाद करने आया जासूस, खुद ही भूल बैठा याददाश्त! कैसी है आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘उड़ता तीर’, पढ़ें पूरा मूवी रिव्यू

भारत को बर्बाद करने आया जासूस, खुद ही भूल बैठा याददाश्त! कैसी है आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘उड़ता तीर’, पढ़ें पूरा मूवी रिव्यू

Udta Teer Movie Review: सोचिए, एक जासूस दूसरे देश को बर्बाद करने के मिशन पर निकले, लेकिन बीच रास्ते में उसकी याददाश्त ही चली जाए। इसके बाद वह दुश्मन देश का वफादार अफसर बनकर अपने ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने लगे, तो क्या होगा? कुछ ऐसा ही दिलचस्प और मजेदार मामला लेकर आई है आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘उड़ता तीर’। जासूसी, आतंकवाद, देशभक्ति और कॉमेडी के इस अनोखे मेल में कहानी गंभीर कम और हंसाने वाली ज्यादा है। करीब 2 घंटे 20 मिनट की यह फिल्म दर्शकों को एक ऐसे मिशन पर ले जाती है, जहां सबसे बड़ा खतरा दुश्मन नहीं, बल्कि एक जासूस की भूली हुई याददाश्त बन जाती है। तो आइए जानते है एक्टर आयुष्मान खुराना की स्पाई और कॉमेडी से भरी इस फिल्म के बारे में-

 

क्या है ‘उड़ता तीर’ की कहानी?

‘उड़ता तीर’ की कहानी बिलाल अहमद (आयुष्मान खुराना) से शुरू होती है, जो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लिए काम करता है। उसका साथी अशफाक (सुहैल नैय्यर) भी इस मिशन में उसके साथ है। दोनों को भारत में घुसकर एक बड़ी साजिश को अंजाम देने की जिम्मेदारी मिलती है। अपने मकसद को पूरा करने के लिए बिलाल और अशफाक भारतीय काउंटर टेररिज्म स्क्वॉड यानी CTS तक पहुंच बना लेते हैं। बिलाल विक्रांत नाम के भारतीय अधिकारी की पहचान अपना लेता है, जबकि अशफाक ध्रुव बनकर यूनिट का हिस्सा बन जाता है। इस तरह दोनों अपने मिशन को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं।  बिलाल की योजना में यामिनी (सारा अली खान) भी अहम भूमिका निभाती है। वह डिफेंस मिनिस्ट्री में काम करती है और बिलाल उससे नजदीकियां बढ़ाता है। उसका मकसद इस रिश्ते के जरिए अपने मिशन के लिए रास्ता आसान करना है।

लेकिन एक हादसा पूरी कहानी बदल देता है। बिलाल कोमा में चला जाता है और जब उसे होश आता है, तो उसकी याददाश्त जा चुकी होती है। अब उसे अपना असली नाम, अपनी पहचान और भारत आने का मकसद कुछ भी याद नहीं रहता। वह खुद को विक्रांत समझने लगता है और भारतीय सुरक्षा अधिकारी की तरह काम करने लगता है। यहीं से फिल्म का कॉमिक ट्रैक शुरू होता है। जो शख्स भारत के खिलाफ साजिश का हिस्सा था, वही अब देश के दुश्मनों को पकड़वाने में जुट जाता है। बिलाल को लगता है कि वह देश की रक्षा कर रहा है, जबकि उसका साथी अशफाक जानता है कि यह सब उसके असली मिशन को बर्बाद कर रहा है।

अशफाक के लिए हालात लगातार मुश्किल होते जाते हैं। वह बिलाल को उसकी पुरानी पहचान और मकसद की तरफ लौटाना चाहता है, लेकिन हर बार परिस्थितियां उसके खिलाफ चली जाती हैं। अपने साथी को रोकने और पाकिस्तानी आकाओं को जवाब देने के बीच फंसा अशफाक फिल्म में हास्य पैदा करता है। यही उलटफेर ‘उड़ता तीर’ की कहानी को सामान्य जासूसी फिल्मों से अलग बनाता है।

आयुष्मान खुराना की अदाकारी फिल्म का मजबूत पक्ष

आयुष्मान खुराना ऐसे किरदारों के लिए पहचाने जाते हैं, जिनमें कॉमेडी के साथ परिस्थितियों से पैदा होने वाला हास्य भी मौजूद होता है। ‘उड़ता तीर’ में उन्हें एक ऐसे जासूस की भूमिका मिली है, जो अपनी असलियत भूल चुका है और पूरे विश्वास के साथ गलत पहचान में जी रहा है। आयुष्मान अपने हाव-भाव, संवाद बोलने के अंदाज और बॉडी लैंग्वेज से किरदार की इस उलझन को पर्दे पर उतारने की कोशिश करते हैं। उन्हें पता ही नहीं कि वह जिस मिशन को देशभक्ति समझ रहे हैं, वह उनकी पुरानी योजना के बिल्कुल उलट है। दर्शकों को सच्चाई मालूम होने और नायक के उससे अनजान रहने के बीच पैदा होने वाला अंतर कई दृश्यों को मनोरंजक बनाता है।

सुहैल नैय्यर ने अशफाक के किरदार में उनका अच्छा साथ दिया है। उनका किरदार कहानी में उस व्यक्ति की तरह है, जिसके सामने सब कुछ गलत हो रहा है, लेकिन वह खुलकर अपनी परेशानी भी जाहिर नहीं कर सकता। बिलाल की हरकतें उसके लिए जितनी गंभीर समस्या हैं, दर्शकों के लिए उतनी ही कॉमेडी का कारण बनती हैं। इसके अलावा CTS प्रमुख बर्मन की भूमिका में राहुल बोस भी प्रभाव छोड़ते हैं। उनके चेहरे के भाव और परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया देने का तरीका कई जगह संवादों से ज्यादा असरदार नजर आता है। उनका संयमित अंदाज कहानी के हास्य को बढ़ाने में मदद करता है।

दिवंगत अभिनेता मुकुल देव आतंकवादी सरगना अजहर मकसूद के किरदार में दिखाई देते हैं। वहीं, राम कपूर पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी और गुलशन ग्रोवर मीर की भूमिका निभाते हैं। इन कलाकारों की मौजूदगी कहानी के जासूसी और मिशन वाले हिस्से को आगे बढ़ाती है। सारा अली खान यामिनी के किरदार में हैं। कहानी में उनकी भूमिका अहम होने के बावजूद उनके चरित्र को ज्यादा गहराई देने की गुंजाइश नजर आती है। इसी तरह रघुबीर यादव जैसे अनुभवी अभिनेता के किरदार का भी अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता था।

दिलचस्प आइडिया, लेकिन हर जगह बराबर असर नहीं

फिल्म की कहानी और निर्देशन की जिम्मेदारी आकाश कौशिक ने संभाली है। इसकी बुनियादी अवधारणा काफी दिलचस्प है। एक जासूस का अपनी याददाश्त खो देना अपने आप में कोई नया विचार नहीं है, लेकिन उसका उसी देश की रक्षा में लग जाना, जिसे नुकसान पहुंचाने के लिए वह आया था, कहानी को अलग दिशा देता है।

फिल्म का पहला हिस्सा इस विचार का बेहतर इस्तेमाल करता है। बिलाल की गलत पहचान और अशफाक की बेचैनी के बीच पैदा होने वाले हालात कहानी में हल्कापन बनाए रखते हैं। यहां दर्शक इस बात का इंतजार करते हैं कि बिलाल अगली बार अनजाने में कौन-सी ऐसी हरकत करेगा, जिससे उसके साथी का मिशन और मुश्किल हो जाएगा।

हालांकि, कहानी आगे बढ़ने के साथ फिल्म का अंदाज बदलने लगता है। दूसरे हाफ में थ्रिल, नए मोड़ और गंभीर घटनाओं पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इससे कॉमेडी की रफ्तार प्रभावित होती है। कुछ घटनाओं का अंदाजा पहले ही लगने लगता है, इसलिए हर ट्विस्ट उतना प्रभावशाली नहीं रह जाता। स्क्रीनप्ले में अगर दूसरे हिस्से में भी पहले हाफ जैसी कसावट और हास्य बरकरार रहता, तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर हो सकता था।

संगीत ‘चन्न’ है सुनने लायक

फिल्म का संगीत सचिन-जिगर ने तैयार किया है। अरिजीत सिंह की आवाज में ‘चन्न’ रोमांटिक एहसास और सुकून देने वाली धुन के कारण खास ध्यान खींचता है। यह उन गानों में शामिल हो सकता है, जिन्हें फिल्म से अलग भी सुना जा सके।

‘जय हिंद’ देशभक्ति का माहौल बनाने की कोशिश करता है, जबकि ‘चूज़े’ फिल्म के हल्के-फुल्के अंदाज के साथ तालमेल बैठाता है। दूसरे गाने भी कहानी की जरूरत के मुताबिक आते हैं, हालांकि कुछ जगह संगीत की वजह से घटनाओं की गति थोड़ी प्रभावित होती है। फिल्म में धर्मा की चर्चित फिल्मों के गानों और ‘खलनायक’ के बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल भी सुनने को मिलता है। कुल मिलाकर संगीत कहानी को सहारा देता है, लेकिन फिल्म का मुख्य आकर्षण इसके गानों के बजाय जासूसी और कॉमेडी का मेल है।

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क्या ‘उड़ता तीर’ देखने लायक है?

अगर आप जासूसी फिल्मों में गंभीर माहौल और लगातार एक्शन देखने के आदी हैं, तो ‘उड़ता तीर’ का अंदाज आपको थोड़ा अलग लग सकता है। यह फिल्म देशभक्ति और खुफिया मिशन की कहानी को हंसी-मजाक के जरिए आगे बढ़ाती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत वह स्थिति है, जिसमें दुश्मन देश का जासूस अपनी पहचान भूलकर उसी देश का रक्षक बन जाता है।

आयुष्मान खुराना की कॉमिक टाइमिंग, सुहैल नैय्यर की परेशानी और राहुल बोस के एक्सप्रेशंस फिल्म को कई मनोरंजक पल देते हैं। पहला हाफ ज्यादा असर छोड़ता है, जबकि दूसरे हिस्से में कहानी की गति और हास्य का स्तर कुछ कमजोर पड़ता है। कुछ ट्विस्ट भी दर्शकों को बहुत ज्यादा चौंकाने में सफल नहीं होते।  ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों में जहां जासूसी की दुनिया को तनाव, रणनीति और गंभीर घटनाओं के जरिए दिखाया जाता है, वहीं ‘उड़ता तीर’ इसी दुनिया को हास्य का आधार बनाती है। यहां सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ मिशन पूरा करने की नहीं, बल्कि उस जासूस को संभालने की भी है, जो अपनी पहचान भूलकर अपने ही साथियों की योजनाओं पर पानी फेर रहा है।

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